Wednesday, April 3, 2013

अजब विकास


इंटरनेट से प्रीत लगी बस
इंटरनेट हुआ रिश्तेदार
यार मित्र की कमी खले ना
याद ना आने दे परिवार
दिनचर्या की धुरी पर ही
जीवन अपना सरपट भागे
घर परिवार को छोड़ के पीछे
दुनियाँ से रहू बस नित आगे
घड़ी पुरानी की भाँति बस
एक बोल पे अटकी ज़ुबान
समय नहीं पड़े कितने काम
जीवन अब कहाँ रह गया आम
माँ की गोद छिनी शिशुओं से
लैपटौप ने बाज़ी मारी
दिन भर माँ सहलाए उसको
भेजे बच्चों को बालवाड़ी
धन से चाहे जेबें अटी हैं
पर सेहत की टूटी छड़ी है
कौन सहारे चल पाओगे
जवाँ उम्र में ढ़ल जाओगे
चूल्हा चौका पड़ा है औंधा
ना कुछ पकता ना कुछ राँधा
सजी रसोई आधुनिक सामान
पर वंचित पूरी पकवान
हुए मुक्त और छूटा झंझट
रेडी टू ईट को खोला झटपट
माइक्रोवेव में गरम किया
और परिवार को परस दिया
मलटी विटामिन नित खाकर भी
सेहत रहती है परेशान
तन में मन भी उलझा-उलझा
क्यूँ ना छोड़े मुझे थकान
भूली दाल-भात तरकारी
रोटी चूल्हे की सिकी करारी
जब से तज दिया ताज़ा खाना
मिलीं भेंट में कई बीमारी
घर तो केवल लगें मकान
रहते संग फीकी पहचान
बात-चीत होती है तब, जब
करने होते बिल भुगतान।
अजब ज़माने ने की उन्नति
मूड़्मति बढ़ी नष्ट सुमति
अनंत ज्ञान की बढ़ी मात्रा
हुई जीवन की लघु यात्रा
जीवन में सब सुख यूँ रूठे
ज्यों पतझड़ में पत्ते सूखें
जाने कैसी कला सीख ली
भीतर रुदन बाहर खुश दीखें
कलयुग का कैसा है जादू
बढ़ा प्रशिक्षण मिट रहे साधू
जन से जन का प्यार घट रहा
जीवन का आधार मिट रहा
डोल रहे नित धरा आकाश
क्या इसको ही कहें विकास।
 
 

 

 

Saturday, March 16, 2013

सेदोका बेटी


सुन बिटिया
बेदर्द जगत में
भरे हुए शैतान
फूँक-२ कर
कदम उठाना, तूँ
लुटे नहीं सम्मान।

 
बेटियाँ तो हैं
प्यार का बेमिसाल
बेहिसाब खज़ाना
अभागी कब
जानें मिला कीमती
हर्ष का तोशाख़ाना।

 
घर अँगना
तज मात-पिता का
घर औरों का जोड़े
दुख संताप
ढोए सब हँस के
पत बाबा की ओढ़े।

 
कुदरत का
अनमोल करिश्मा
तेरी गूढ़ कहानी
रब का रूप
सृजन का आधार
बेटी नहीं निमानी।

 
मंदमति ही
चाहें बेटा, बेटी का
मोल जान ना पाए
बेटा केवल
बँटवाता सम्पत्ति
बेटी दुख बँटाए।


मैं तो बेटी हूँ
माँ की आँख का पानी
बाबा की नन्हीं रानी
दीए सी जलूँ
पीहर में परायी
सासरे में बेगानी।

 

 

 

 

 

Tuesday, March 12, 2013

रिश्ते


रिश्ते जु़ड़ते
भावना तंतुओं से
अदृष्य होती
प्रीत बंध की डोरी
जुड़े, जाए ना तोड़ी
टूट जाएं तो दिल में
ऐसा करें आघात
पल भर में
ऐसी हो दूरी ज्यों
नदिया के पाट
स्वार्थ कीट
जब पले ह्रदय में
कुतरे कोमल संबंध
जीवन में जब होश फिरे
तब तक उड़ जाती
रिश्तों से मृदु गंध
पल-पल टीस उठे ह्रदय में
भीतर को झकझोरे
कितना भी प्रयास करें
किरचें ना जुड़ें फिर जोड़े
खंडित रिश्तों से जब-तब
ऐसा रिसे मवाद
सड़-सड़ कर नासूर बनें
प्राणों को करे हताश
प्रीत पगे जल से
रिश्तों का
भरते रहो उदंचन
मिटे विषाद
मिले अपनों का
तुमको नित भुज-बंधन
रिश्ते महक रहेंगे ऐसे
ज्यों महके वन चंदन।